गुरुवार, 26 अगस्त 2021

प्रतिमान

प्रतिमान निहार रहा जन को।

निज रूप पुकार रहा मन को ।

व्यथा हि व्यथा से विवाद रहा ।

मोद सदा निर्विवाद रहा।

प्रतिमान ने भि सत्य कहा है कहा ।

दिखा जो प्रतिबिंब वही है कहा  ।

म्रगांक कि ज्योति से ज्योत्स्ना बनी ।

उसे हि कंर्दप क्षुधार्त चकोर निहार रहा।

धूसर के खुर से धूल उडी ।

जिसे जन यह मलयाग्रत गंध पुकार रहा।

तट कि ज्योति को ज्योति समझ ।

तरणी के प्रभुत्व को नकार रहा ।

सारंग लिए कस्तूरी को कानन में है भाग रहा ।

निज से निज कि दुरी को वह सदियों से है नाप रहा।

1 टिप्पणी:

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