बहुत हुआ अब, बहानोंका सहारा अब और नही
आलस की पोथी अब और नही।
धेय्य मुक्कमल ना हो , तब तक कोई आराम नही
पैरोंको कोई थकान नही।
हार जाऊ अगर मैं , इस सोच का अब साथ नही
हमसे ना होगा , ये अल्फाज अब लबों पर नही।
आकांक्षाएं बहुत हैं, आशाएं अब कुछ नही
बेशक रुकावटे काफी हैं, पर निराशाओंकी चादर नही।
थक सकता हैं शरीर मगर, मन का थकना मंजूर नही
ठुकराएँ दुनिया अगर , डर के रुक जाना पसंद नही।
सही हूँ मैं, ये सब को बार बार बताना जरूरी नही
बार बार एक ही गलती दोहराना भी सही नही।
इन सब से डर कर अपने प्रयत्नोंको रोक दु , इतनी मैं कमजोर नही
अपने लक्ष्य से बढ़कर मेरे लिए अब और कोई मंजिल नही।
🖤वृन्दा🖤
