प्रतिमान निहार रहा जन को।
निज रूप पुकार रहा मन को ।
व्यथा हि व्यथा से विवाद रहा ।
मोद सदा निर्विवाद रहा।
प्रतिमान ने भि सत्य कहा है कहा ।
दिखा जो प्रतिबिंब वही है कहा ।
म्रगांक कि ज्योति से ज्योत्स्ना बनी ।
उसे हि कंर्दप क्षुधार्त चकोर निहार रहा।
धूसर के खुर से धूल उडी ।
जिसे जन यह मलयाग्रत गंध पुकार रहा।
तट कि ज्योति को ज्योति समझ ।
तरणी के प्रभुत्व को नकार रहा ।
सारंग लिए कस्तूरी को कानन में है भाग रहा ।
निज से निज कि दुरी को वह सदियों से है नाप रहा।
Very nice
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