मंगलवार, 10 जनवरी 2023

पागल

 


चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ,

उसके दिल की हर एक बात तुम्हें बताता हूं,

 वह यूं ही नहीं भटकता है दरबदर उसके भटकने का हर एक राज बताता हूं,


 चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ।

  

उसके दिल पर रखा होगा कोई भारी पत्थर,

 फिर भी चलो मैं तुम्हें उस की धड़कनें सुनाता हूं ,

 चलो उस पत्थर का मैं तुम्हें भार बताता हूं,

  चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ।

  

धूप धाम दिन शाम को ककरिली सड़कों पर चलता जीवन दिखाता हूं ,

चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ,


उसके दिल में है भूख और मन में है प्यास,

 फिर भी मैं तुम्हें उसके अधरों पर मुस्कान दिखाता हूं,

  चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ।

  

हट हट चल भाग यहां से गूंजता उसके कानों में सौ बार सुनाता हूं,

 चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं,

  रोटी के लिए जो चलता है दिन रात आंखें मलता है ,

  चलो मैं तुम्हें उसके आंसू दिखाता हूं,

   चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ।

   

उसकी हरकतों में छीना झपटी और पांव में छाले हैं,

 उसको देख लोग काला साया कहने वाले हैं,

  चलो मैं तुम्हें टोने, टोटके, मंत्र, जादू का खेल असरदार दिखाता हूं ,

  चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं ।

  

दिल टूटे भी ना, साथ छूटे भी ना ,कोई रूठे भी ना, सिर फूटे भी ना, कुछ लुटे भी ना ,

जिंदगी की अजब रफ्तार दिखाता हूं ,

बस यही है पागल जिसे मैं तुम्हें बताता



प्रवीण शुक्ला( शास्त्री जी).........🖋️🖋️


शनिवार, 6 नवंबर 2021

जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद

 जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद–


प्रेमचंद जी का शव पड़ा हुआ था। उस निर्जीव शरीर को गोद में चिपटाये भाभी शिवरानी आकाश का भी हृदय दहला देने वाला करुण क्रन्दन कर रही थीं। श्मशान जाने के लिये नगर के सैंकडों संभ्रान्त साहित्यिक उतावले हो रहे थे। कुछ अपने दु:ख का वेग नही सम्भाल पा रहे थे। कुछ को 'और भी बहुत से काम थे।' उन्हें जल्दी थी 'इस काम से निबट जाने की' और कुछ ने मुझे बतलाया था कि वह रास्ते से ही अलग हो जायेंगे, श्मशान तक न जा सकेंगे।


दूसरी ओर भाभी शिवरानी शव को किसी को छूने नहीं दे रही थीं। सबने 'प्रसाद' जी से कहा -- 'आप ही समझायें।' वे आगे बढ़े। भाभी से बोले -- 'अब इन्हें जाने दीजिये।'


वे क्रोध पूर्वक चीख़ उठीं --- 'आप कवि हो सकते हैं पर स्त्री का हृदय नहीं जान सकते। मैंने इनके लिये अपना वैधव्य खंडित किया था। इनसे इसलिये नहीं शादी की थी कि मुझे दुबारा विधवा बना कर चले जायें। आप हट जाइये।' 


प्रसाद जी के कोमल हृदय को वेदना तथा नारी की पीड़ा ने जैसे दबोच लिया। उनका गला भर आया। नेत्रो मे आँसू छलछला उठे।


मैं ही सामने खड़ा दिखाई पड़ी। मुझसे भर्रायी आवाज में बोले -- ' परिपूर्णा, तुम्हीं सम्भालो। 'भाभी चिल्लाती चीखती रहीं और मैंने 'अब यह प्रेमचंदजी नहीं हैं, मिट्टी है'--- कहकर मुर्दा उनकी गोद से छीन लिया।


उस घटना के बाद मैंने प्रसाद जी को कभी हँसते नहीं देखा। उनके शरीर में क्षय घुस चुका था।


जब चिता की लपट उन्हे समेटने लगी, सब लोग इधर उधर की बातें भी कर रहे थे। प्रेमचन्द जी के सम्बन्ध में कलप रहे थे। पर एक व्यक्ति मौन, मूक, एकटक चिता की ओर देखता रहा। प्रेमचंद जी का शव उठाने के समय ऐसी घटना हो गई थी उसके साथ कि उसका मन रो रहा था और शायद वह देख रहा था -- छ: महीने के बाद अपनी चिता भी...

 वह थे श्री जयशंकर 'प्रसाद'।


(बीती य़ादें~ परिपूर्णानन्द वर्मा)


चित्र-- मृत्यु से दो दिन पहले का, प्रेमचंद जी की सेवा करती शिवरानी देवी। जमाना (ऊर्दू) अक्टूबर १९३६ कानपुर  मे प्रकाशित। 


अनूप शुक्ला जी की वॉल से साभार।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

मेरे ख़त का जवाब मत देना

 


सुनो मैं पागल हु ,आवारा हु, 

         मैं तुम्हें खत लिखुंगा 

                  पर तुम मेरे ख़त का जवाब मत देना।


सुनो मैं बेशर्म हु, बेहया हु ,

          मैं रास्ते में मिलुगा ,नजरें मिलाऊंगा,

                    पर तुम नजरें झुका लेना।


सुनो मै राही हु, मैं मुसाफिर हूं,

           मैं तुम्हारी गली का चक्कर लगाउंगा,

                       पर तुम मुझे देख कर नजरंदाज कर देना ।


सुनो मैं पागल हु ,दिवाना हुं,

           तुम्हारे लिए महंगे तोहफे लाऊंगा ,

                        पर तुम उसे बेरुखी से बस ठुकरा देना।

 

सुनो मैं आवारा हु , मुसाफिर हूं,

          मैं जब मिलूं तुम्हें चैराहों पर,

              तो अब सच कहता हु मुझे देख कर बस मुस्कुरा देना।,

              

सुनो मै पागल हु , आवारा हुं ,

         मैं तुम्हें खत लिखुंगा ,

                 पर तुम मेरे ख़त का जवाब मत देना।...........              

Praveen Shukla.......

                                                                         

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

प्रतिमान

प्रतिमान निहार रहा जन को।

निज रूप पुकार रहा मन को ।

व्यथा हि व्यथा से विवाद रहा ।

मोद सदा निर्विवाद रहा।

प्रतिमान ने भि सत्य कहा है कहा ।

दिखा जो प्रतिबिंब वही है कहा  ।

म्रगांक कि ज्योति से ज्योत्स्ना बनी ।

उसे हि कंर्दप क्षुधार्त चकोर निहार रहा।

धूसर के खुर से धूल उडी ।

जिसे जन यह मलयाग्रत गंध पुकार रहा।

तट कि ज्योति को ज्योति समझ ।

तरणी के प्रभुत्व को नकार रहा ।

सारंग लिए कस्तूरी को कानन में है भाग रहा ।

निज से निज कि दुरी को वह सदियों से है नाप रहा।

बुधवार, 11 अगस्त 2021

इंतजार




कभी तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह....




जब तुम न जग पाओ और नींद भी न हो

जब मेरे आने की उम्मीद भी न हो

जब मुझसे बात करने के लिए छटपटाओ तुम

और फिर उस बात का कुछ कर न पाओ तुम


तब तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह....


जब मेरे किसी फैसले पर तुम्हारी उंगलियां उठें

जब गुस्से की तुम्हारे मन में बिजलियाँ उठें

जब अपने ही आंसुओ से धुल जाओ तुम

जब कहने को मैं न मिलूं, और अंदर ही अंदर घुल जाओ तुम


तब तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह....


जब वादा कर के जाऊं कि कुछ बदलेगा नहीं

जब तुमको समझ में आये कि वो लौटेगा नहीं

जब मैं कहूँ कि मेरी मजबूरी इस बार भी तुम ही समझो

जब मैं कहूँ मुझे अब काम है ये प्यार भी तुम ही समझो


तब तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह....


जब तुम चाहते हुए भी अपने हलक़ में अपनी चीखें घोल नहीं पाओ

जब तुम सारी बातें सिर्फ लिख पाओ, उसे बोल नहीं पाओ

जब तुम न खाओ , न पीयो , जिस्म जब साथ छोड़ने लगे

जब मेरी ख्वाहिश तुम्हारी रगों की हर बूंद निचोड़ने लगे


तब भी...तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह....


जब तुम्हारी एक गलती हर पल हर दिन दिल तोड़े तुम्हारा

जब एक दिन मेरे साथ जीने की तमन्ना साथ न छोड़े तुम्हारा

जब मैं अपनी ज़िंदगी में किसी और को तुमसे बड़ा कर दूं

जब मैं तुम्हें सब समझने के लिए छोड़ दूं, खुद को जुदा कर दूं


तब भी....तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह....


इसके बाद भी मैं तुम्हारी परेशानी कुछ न समझूँ

जब तुम कुछ भी बताओ और मैं सच न समझूँ

जब मुझे कोई खुशी मिले तो तुम्हारी एक न सोचूं

जब कोई फैसला लूँ तो तुमसे एक न पूंछू


इसके बाद भी....तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह


मेरा इंतज़ार इस तरह करना


कि तुम्हारा खुद का खुद में कुछ बचे नहीं

दिल तुम्हारा साथ न दे दिमाग तुम्हारा सुने नहीं

तुम इस बारे में किसी से कुछ कह न पाओ 

जब तुम सब चीज़ हँस के सहो मगर सह न पाओ

इस कदर कि तुम्हारा दर्द शोर करने लगे

तुम्हारी घुटन इक आवाज़ हर ओर करने लगे


मगर फिर भी मैं कहूँ कि अपनी नहीं मेरी मजबूरियां समझो

और तुम्हारी शराफ़त तुमको सर झुकाकर सिर्फ इंतज़ार करने को कहे....

उस समय कहीं लिख लेना कि कैसा लगता है, 

अकेले अकेले प्यार करना, अकेले अकेले इंतज़ार करना, जो तुम भी जानती होगी कि कभी खत्म नहीं होगा....


मगर फिर भी....तुम मेरा इंतज़ार करना इस तरह


एक बार इस तरह इंतज़ार करके हिसाब बराबर कर लेना....तब तक ये इंतज़ार तुमपर उधार रहा।




अज्ञात

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

दर्पण नहीं मरा करता है दादा नीरज कि कविता

 


छिप-छिप अश्रु बहाने वालो ! 

मोती व्यर्थ बहाने वालो !

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।


सपना क्या है? नयन सेज पर

सोया हुआ आँख का पानी,

और टूटना है उसका ज्यों

जागे कच्ची नींद जवानी

गीली उमर बनाने वालो।

डूबे बिना नहाने वालो !

कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है। 


माला बिखर गयी तो क्या है

ख़ुद ही हल हो गई समस्या,

आँसू गर नीलाम हुए तो

समझो पूरी हुई तपस्या,

रूठे दिवस मनाने वालो !

फटी कमीज़ सिलाने वालो !

कुछ दीपों के बुझ जाने से आँगन नहीं मरा करता है। 


खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर

केवल जिल्द बदलती पोथी ।

जैसे रात उतार चाँदनी

पहने सुबह धूप की धोती

वस्त्र बदलकर आने वालो !

चाल बदलकर जाने वालो !

चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।


लाखों बार गगरियाँ फूटीं

शिकन न आई पनघट पर

लाखों बार किश्तियाँ डूबीं

चहल-पहल वो ही है तट पर

तम की उमर बढ़ाने वालो

लौ की आयु घटाने वालो

लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।


लूट लिया माली ने उपवन

लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,

तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर

खिड़की बन्द न हुई धूल की,

नफ़रत गले लगाने वालो !

सब पर धूल उड़ाने वालो !

कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है। 


- गोपालदास नीरज 




शनिवार, 19 जून 2021

अनकही


 और किस जबां से

लिख दूं दिल की बात

कोई बात दिल की

तुम तक पहुंचती ही नहीं


छू लेती है 

न जाने कितनों का मन

आंगन तुम्हारे जा कर 

ये ठहरती ही नहीं


बड़ी बेताब होती हैं

निकलती हैं जब मन से

उतनी ही हताश 

पड़ी रहती हैं जब

तुमसे कहीं ये मिलती नहीं है


एक बार सही 

कह दो इनसे आकर 

न फूटें नज़्म बन

इन मीठे लफ़्ज़ों की

तुमसे बनती नहीं है 


चुप ही रहेंगे उम्र भर जब 

जानेंगे ख़यालों के आखिरी 

हिस्से में तुम्हारी,

कहीं दर्ज इनकी

गिनती नहीं है


और किस जबां से लिख दूं

तुम संग एक मुलाकात

अभागे इन लफ़्ज़ों से

कोई बात अब,बनती नहीं है



पागल

  चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं , उसके दिल की हर एक बात तुम्हें बताता हूं,  वह यूं ही नहीं भटकता है दरबदर उसके भटकने का हर एक राज बताता...