और किस जबां से
लिख दूं दिल की बात
कोई बात दिल की
तुम तक पहुंचती ही नहीं
छू लेती है
न जाने कितनों का मन
आंगन तुम्हारे जा कर
ये ठहरती ही नहीं
बड़ी बेताब होती हैं
निकलती हैं जब मन से
उतनी ही हताश
पड़ी रहती हैं जब
तुमसे कहीं ये मिलती नहीं है
एक बार सही
कह दो इनसे आकर
न फूटें नज़्म बन
इन मीठे लफ़्ज़ों की
तुमसे बनती नहीं है
चुप ही रहेंगे उम्र भर जब
जानेंगे ख़यालों के आखिरी
हिस्से में तुम्हारी,
कहीं दर्ज इनकी
गिनती नहीं है
और किस जबां से लिख दूं
तुम संग एक मुलाकात
अभागे इन लफ़्ज़ों से
कोई बात अब,बनती नहीं है

Kya baat hai
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