मंगलवार, 23 मार्च 2021

आप सभी को मेरा प्रणाम ये प्रेम विरह कि कविता लिखने का प्रथम प्रयास है ।।

 इसके लिए मुझे कोई शीर्षक सूझ हि नहीं रहा है आप लोग इसे पढ़े और पढ़ कर क्रपया इस कविता के लिए एक उचित शीर्षक बताएं





      काश मैं तुमसे मिला हि नहीं होता।

                            उस दिन मैं वहां गया हि न होता।

     कुछ दिन तो मैंने तुमसे बातें कि ही न थी।

                            काश आगे भी मैने वही किया होता।

     चेहरा लेकर तुम सामने आयें।

                            मैं उसे हि दिल समझ बैठा।

      जब भी दिल को खंगालना चाहा।

                           तुमने दिमाग से उलझाये रखा।

     इन उलझनों को सुलझाने की कोशिश में।

                           मैं कितना उलझ कर रह गया हूं।

    फिर भी सबसे कहता हूं ।

                           देखो मैं कितना सुलझ गया हूं।

  आखिर क्या गलती थी मेरी ।

                     मैंने तो बस सच्चे दिल का यार चाहा था।

  दो जून की रोटी नहीं ।

                मैंने तो बस ढाई आखर का प्यार चाहा था।

खैर तुम्हारी फिदरत को मैं क्या कहूं । 

               इस धरा पर टहलती खुद कि बद्दुआ कहूं।

गिरगिट तो हो नहीं पर रंग बहुत बदलते हो ।

               पर वो बड़ा खुशनसीब होगा ।

जिसके सामने तुम बेरंग टहलते हो।

                     तुमने पूछा कि क्या कहते हो ।

अलविदा कहा जाये क्या ।

                       अब तुम्हारे बिना रहा जाये क्या।

तुम झूठे हो फिर भी तुम्हें झूठा न कहा जाए क्या ।


       अब तुम बताओ क्या कहते हो।।

                      अलविदा कहा जाये क्या।।

                      अलविदा कहा जाये क्या।।

                      अलविदा कहा जाये क्या।।

                      


5 टिप्‍पणियां:

पागल

  चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं , उसके दिल की हर एक बात तुम्हें बताता हूं,  वह यूं ही नहीं भटकता है दरबदर उसके भटकने का हर एक राज बताता...