सोमवार, 17 अगस्त 2020

प्रेम अग्नि कि ज्वाला है

 मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, 

मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ? 

काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, 

मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ? 


मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ? 

मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ? 

मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने ? 

या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ? 


पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ? 

नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ? 

मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने- 

फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने !


अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है- 

क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है ? 

वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है- 

वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है 


मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया- 

मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है ! 

मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ 

कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँ 


मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने 

इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने ! 

भव सारा तुझपर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने- 

तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने

7 टिप्‍पणियां:

पागल

  चलो मैं तुम्हें आज पागल सुनाता हूं , उसके दिल की हर एक बात तुम्हें बताता हूं,  वह यूं ही नहीं भटकता है दरबदर उसके भटकने का हर एक राज बताता...