किन्तु इन सभी के बीच जो एक वास्तविक सिद्धान्त कार्य करता हैं जिसमें तीन प्रक्रिया निहित है
1- प्रयास
2- विकास
3- विनाश
सभी सभ्यताओं ने प्रक्रति कि इन तीनों प्र्रक्रिया का सामना किया।
आज जब मानव सभ्यता का यह विकसित या यूं कहिए कि विकासशील रुप हमारे सामने है जिसके हम प्रत्यक्ष साक्षी है
वह अत्यंत हि डरावना है ।
क्युकी आज कि सभ्यताओं में प्रक्रती कि कोई एक प्रक्रिया नहीं बल्कि यहां तो , विकास और विनाश , दोनों ही सहचर बन गए हैं।
मैं अपने अनुभव को कहुं तो मैंने संपूर्ण मानव सभ्यता को तो नहीं देखा किंतु जितना देखा है उसमें गुजरा हुआ वर्ष और वर्तमान वर्ष एक अलग ही दिशा की ओर बढ़ रहा है ।
आज के मनुष्य के क्रत्य अत्यंत निंदनीय है मैं तो यहां तक कहता हूं की इसे क्रत्य कहना हि नहीं चाहिए
पिछले कुछ महीनों से हम सभी एक विनासक प्रलयंकारी महामारी से जूझ रहे हैं सम्पूर्ण वैश्विक बुद्धजीवी समाज के लिए यह चिंता का विषय है किंतु इन्ही सब के बीच हमारे कर्मयोगियो का कार्य अत्यंत सराहनीय है। आज के समय में जब निराश और अवसाद कि काली रात हर तरफ मुश्किलें और हार का भय है। चुनौतियां मुंह बाए अपने विकराल रूप में खड़ी है।
वहीं इन सब से बेखबर वे अपनी जिजीविषा और अदम्य उत्साह के साथ जुटे हैं काली रात को भोर में बदलने में।कई बार उन्हें भि ऐसा लगा होगा कि नहीं शायद अब और नहीं लेकिन उन्ही अंधेरों के बीच से जिंदगी ने कहा होगा कि देखो उजास हो रहा है।
ऐसे कर्मयोद्धाओ पर भी जब इस निर्दयी और निरंकुश समाज के कुछ अराजक तत्व जिसे शासन प्रशासन का भी भय नहीं जो श्यंम मरने और दुसरो को मारने पर तुला है इन्हे इतिहास कभी भी माफ नहीं करेगा ।।।
आंसिक विचार,##
प्रवीण शुक्ला (शास्त्री जी)

Good
जवाब देंहटाएंवाह शास्त्री जी
जवाब देंहटाएंसत्य वचन
Eye opening views nice thought
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंनेक विचार है
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंमार्मिकता से ओतप्रोत
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